संजय टाइगर रिजर्व के बीच बसे 6 गांवों का हुंकार: “घर नहीं छोड़ेंगे, सुविधाएं दो”, 400 ग्रामीणों संग सरपंच पहुंचे कलेक्ट्रेट
एमपी के सीधी जिले में आज एक अनोखा और भावुक विरोध देखने को मिला, जब छह गांवों के सरपंचों के नेतृत्व में लगभग 400 ग्रामीण जिला पंचायत कार्यालय पहुंचे और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए स्पष्ट कहा “हम अपनी मातृभूमि छोड़कर नहीं जाएंगे, प्रशासन हमें मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराए।” यह सभी गांव संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बीचो-बीच स्थित हैं, जहां लंबे समय से सड़क, बिजली, पानी, आवास और शिक्षा जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।
वही इस ज्ञापन में ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास रहने के लिए पक्के मकान नहीं हैं, गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है, बिजली व्यवस्था नगण्य है और पीने के पानी की गंभीर समस्या है। जहा शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है “पांचवीं कक्षा के बाद बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।”
वही प्रदर्शन में शामिल सरपंचों में धनंशाय बैगा (खैरी), हरिराम सिंह (डेवा), नानबाई बैगा (खरबर), अंजू सिंह (उमरिया), गिरधारी लाल बैगा (चिंगवाह) और रानी सिंह (दुबरी कला) प्रमुख रहे। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि लगभग 50 हजार से अधिक आबादी वाले इस आदिवासी बहुल क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की जा रही है — “नेता केवल चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं, उसके बाद कोई सुध नहीं लेता।”
जहा ग्राम डेवा के सरपंच हरिराम बैगा ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हमारे आसपास के जंगल ही हमारा घर हैं। सरकार जानवरों के संरक्षण के नाम पर हमें अपने ही घर से विस्थापित कर रही है। क्या जानवर रह सकते हैं और हम नहीं?” वहीं दुबरी कला की सरपंच रानी बैगा ने बताया कि रास्ता न होने के कारण सामाजिक जीवन भी प्रभावित है “यहां शादियां तक नहीं हो पातीं, लोग अपनी बेटियों का रिश्ता इस क्षेत्र में नहीं करना चाहते।”
जहा इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए सीधी कलेक्टर स्वरोचिष सोमवंशी ने कहा कि यह क्षेत्र विस्थापन प्रक्रिया के अंतर्गत आता है और वन्यजीवों के खतरे को देखते हुए ग्रामीणों से जंगल से दूर सुरक्षित स्थानों पर बसने की अपील की जाती है। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रशासन संवेदनशीलता के साथ आवश्यक कार्रवाई करेगा।
वही यह पूरा घटनाक्रम विकास बनाम विस्थापन की जमीनी हकीकत को उजागर करता है, जहां एक ओर वन्यजीव संरक्षण की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर पीढ़ियों से बसे आदिवासी समुदाय का अस्तित्व और अधिकार।

