मूंग की खेती पर बढ़ा विवाद: अधिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से स्वास्थ्य और मिट्टी पर खतरे की आशंका
प्रदेश में मूंग की खेती को लेकर नई बहस छिड़ गई है। रिपोर्टों के अनुसार किसानों द्वारा अधिक उत्पादन और जल्द फसल तैयार करने के लिए बार-बार कीटनाशकों के छिड़काव का दावा किया जा रहा है। इससे फसल की गुणवत्ता, मानव स्वास्थ्य और मिट्टी की उर्वरता पर सवाल उठ रहे हैं।
खबर के मुताबिक, कुछ किसान बताते हैं कि मूंग की फसल में इल्ली और अन्य कीटों से बचाव के लिए अलग-अलग कीटनाशकों का लगभग हर 10 दिन में छिड़काव किया जाता है। वहीं फसल सुखाने के लिए भी रसायनों का उपयोग किए जाने की बात सामने आई है। किसानों का कहना है कि अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए यह तरीका अपनाना उनकी मजबूरी बन गया है।
कृषि मंत्री कमल पटेल ने भी इस विषय पर चिंता जताते हुए कहा है कि अत्यधिक कीटनाशकों के उपयोग वाली खेती भविष्य में नुकसानदायक साबित हो सकती है। उन्होंने किसानों से ऐसी खेती से बचने और सुरक्षित कृषि पद्धतियां अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो इसके गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परिणाम सामने आ सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कुछ किसान स्वयं इस मूंग का सेवन नहीं करते। हालांकि यह व्यक्तिगत बयान हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी फसल में कीटनाशकों का उपयोग केवल अनुशंसित मात्रा और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए। अनुचित या अत्यधिक छिड़काव से मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्रदेश में बड़े पैमाने पर मूंग की खेती होती है। ऐसे में विशेषज्ञों ने किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM), जैविक उपायों और संतुलित कृषि तकनीकों को अपनाने की सलाह दी है, ताकि उत्पादन के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सके।
नोट: इस समाचार में शामिल कुछ दावे संबंधित व्यक्तियों और रिपोर्टों पर आधारित हैं। इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक या सरकारी पुष्टि का उल्लेख उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित पक्षों के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।

