निजी स्कूलों में भारी फीस, सरकारी स्कूलों में बदहाल व्यवस्थाएं, बच्चों के भविष्य से हो रहा खिलवाड़
सीधी/सिहावल। जिले के सिहावल मुख्यालय क्षेत्र में हमारे द्वारा निजी एवं शासकीय विद्यालयों का क्षेत्रीय भ्रमण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया। निरीक्षण के दौरान कई चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आईं। एक ओर निजी विद्यालय अभिभावकों से मोटी फीस वसूल रहे हैं, वहीं सवाल यह भी है कि क्या अभिभावक कभी विद्यालय पहुंचकर यह देखते हैं कि उनके बच्चों के पठन-पाठन एवं मूलभूत सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है।
वहीं शासन द्वारा संचालित शासकीय विद्यालयों की स्थिति कई स्थानों पर बेहद चिंताजनक दिखाई दी। शिक्षकों को शासन द्वारा नियमित वेतन मिलने के बावजूद यदि विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था एवं मूलभूत सुविधाएं बदहाल हों, तो यह शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।
भ्रमण के दौरान कहीं पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं मिली, तो कहीं शिक्षक एवं बच्चे दूर-दराज़ से बोतलों में पीने का पानी लाने को मजबूर दिखाई दिए। वहीं दूसरी ओर छोटी-छोटी बच्चियों को बहते नाले में मध्यान्ह भोजन के बाद थालियां धोते हुए देखा गया। जबकि भोजन बनाने एवं अन्य कार्यों के लिए समूह संचालकों के अधीन रसोइयों की नियुक्ति की जाती है। ऐसे में बच्चों से इस प्रकार का कार्य कराना गंभीर लापरवाही का मामला प्रतीत होता है।
निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि कई विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन निर्धारित मीनू के अनुरूप नहीं परोसा जा रहा है। बच्चों को अधिकांश दिनों केवल दाल-चावल ही उपलब्ध कराया जाता है, जबकि मीनू पटल पर अंकित अन्य खाद्य सामग्री केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है। यदि यह स्थिति सही है, तो बच्चों के पोषण एवं शिक्षा दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
शिक्षकों का कहना है कि जब भी भोजन व्यवस्था में सुधार की बात उठाई जाती है, तो उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कई विद्यालयों में समूह संचालन प्रभावशाली व्यक्तियों अथवा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों के हाथ में होने के कारण शिकायतों के बावजूद व्यवस्थाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।
इसी संबंध में शासकीय प्राथमिक शाला जोकी के प्रधानाध्यापक सुखलाल वर्मा ने बताया कि, “मैं 2 जुलाई से इस विद्यालय में पदस्थ हूं। तब से यहां बच्चों को दाल-चावल के अलावा कोई अन्य व्यंजन नहीं दिया गया है। समूह संचालक केवल दाल-चावल देकर चले जाते हैं।
मीनू पटल के अनुसार भोजन कभी नहीं बनाया जाता।”
क्षेत्र भ्रमण के दौरान इस संबंध में बी.आर.सी. श्री मुन्नालाल साकेत से दूरभाष के माध्यम से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया और कॉल काट दी।
परिणामस्वरूप इस मामले में उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर विद्यालयों में पेयजल, गुणवत्तापूर्ण मध्यान्ह भोजन एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए क्या कार्रवाई करते हैं।
न्यूज़ E7 लाइव
रिपोर्ट: राजबहोर केवट
सीधी–सिहावल

