“दो महीने में ट्रांसफर पर हाईकोर्ट सख्त,स्टे मिलते ही कपूर त्रिपाठी की मोरवा थाने में वापसी, ‘2 साल कार्यकाल’ नियम फिर चर्चा में”
सिंगरौली,मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर बेंच के हस्तक्षेप के बाद मोरवा थाना प्रभारी (TI) के पद को लेकर हुए त्वरित तबादले पर बड़ा मोड़ आ गया है। कोर्ट से स्थगन (स्टे) मिलने के बाद कपूर त्रिपाठी ने एक बार फिर मोरवा थाने की कमान संभाल ली है। इस घटनाक्रम ने प्रदेश में पुलिस अधिकारियों के न्यूनतम कार्यकाल को लेकर बनी नीति और उसके पालन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल अब कपूर त्रिपाठी को 12 जनवरी 2026 को मोरवा थाना प्रभारी बनाया गया था, लेकिन महज दो महीने के भीतर 26 मार्च को उनका स्थानांतरण कर दिया गया। इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रथम दृष्टया पाया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के विपरीत है, जिसमें थाना प्रभारियों का न्यूनतम कार्यकाल 2 वर्ष निर्धारित किया गया है।
हाई कोर्ट के स्टे आदेश के बाद देर रात ही कपूर त्रिपाठी ने मोरवा थाने पहुंचकर पुनः पदभार ग्रहण कर लिया। उनके स्थान पर भेजे गए डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह अब वापस जियावन थाना प्रभारी के रूप में कार्यभार संभालेंगे।
“ट्रांसफर इंडस्ट्री पर कोर्ट की सख्ती”
अब यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस विभाग में तेजी से होने वाले तबादलों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाता है। बार-बार होने वाले ट्रांसफर से न केवल प्रशासनिक स्थिरता प्रभावित होती है, बल्कि कानून-व्यवस्था पर भी असर पड़ता है। हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट संकेत देता है कि यदि नीति के खिलाफ निर्णय लिए जाएंगे तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी।
जहा फिलहाल इस मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 को निर्धारित है। तब तक कपूर त्रिपाठी मोरवा थाना प्रभारी के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अंतिम निर्णय क्या आता है और क्या यह मामला प्रदेश में ट्रांसफर नीति के सख्त पालन की दिशा में मिसाल बनेगा।

