काशी के घाटों में बसता रीवा का इतिहास,तुलसी घाट के पास ‘रीवा घाट’ से झलकता विंध्य-वाराणसी का अटूट रिश्ता
उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पावन गंगा तट पर स्थित रीवा घाट सिर्फ एक शांत घाट नहीं, बल्कि विंध्य क्षेत्र और काशी के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत प्रमाण है। तुलसी घाट के समीप स्थित यह घाट ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और स्थापत्य दृष्टि से विशेष महत्व रखता है, जो आज भी रीवा रियासत की विरासत को संजोए हुए है।
अब इतिहासकारों और विभिन्न सांस्कृतिक वेबसाइटों के अनुसार, इस घाट का प्रारंभिक निर्माण महाराजा रणजीत सिंह के पुरोहित लाला मिसिर द्वारा कराया गया था। इसी कारण इसे पहले लाला मिसिर घाट या लीलाराम घाट के नाम से जाना जाता था। बाद में सन् 1879 में महाराजा रघुराज सिंह जूदेव ने इस घाट और उससे जुड़े महल को खरीदकर इसका व्यापक सौंदर्यीकरण कराया और इसे रीवा राज्य की पहचान से जोड़ दिया।
जहा इतिहास के पन्नों में यह भी उल्लेख मिलता है कि रीवा राजघराने का वाराणसी से गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। काशी को मोक्ष नगरी मानने वाले रीवा नरेश यहां नियमित रूप से आते थे और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते थे। इसी जुड़ाव को मजबूत करने के उद्देश्य से उन्होंने इस घाट को अपने संरक्षण में लिया। बाद में वर्ष 1955 में इस संपत्ति को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को दान कर दिया गया, जिससे यह स्थान शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बन गया।
रीवा के इस घाट की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित चार मंजिला ‘रीवा कोठी’ है, जो चुनार के पत्थरों से बने मजबूत स्तंभों और बाढ़ प्रतिरोधी संरचना के लिए जानी जाती है। कई ट्रैवल और हेरिटेज वेबसाइट्स इस कोठी को काशी की कम चर्चित लेकिन बेहद खूबसूरत धरोहरों में गिनती हैं। वर्तमान में यह भवन बीएचयू के संगीत और थिएटर विभाग के छात्रों के लिए छात्रावास के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है, जहां योग, ध्यान, संगीत साधना और नाट्य गतिविधियां नियमित रूप से होती हैं।
वही घाट की शांति, भीड़भाड़ से दूरी और आध्यात्मिक वातावरण इसे खास बनाते हैं। जहां एक ओर अस्सी घाट और तुलसी घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, वहीं रीवा घाट एक सुकूनभरा अनुभव प्रदान करता है।
जहा आज भी रीवा और विंध्य क्षेत्र के लोगों के लिए यह घाट गर्व और अपनत्व का प्रतीक बना हुआ है। काशी यात्रा के दौरान यहां पहुंचकर लोग न केवल गंगा के दर्शन करते हैं, बल्कि अपने ऐतिहासिक जुड़ाव को भी महसूस करते हैं। इस तरह रीवा घाट, बनारस और विंध्य के बीच सांस्कृतिक सेतु के रूप में आज भी अडिग खड़ा है।

