मगर की दर्द भरी (और थोड़ी मजेदार) कहानी
“लो भाई… फिर आ गए ये लोग!
मैं तो पिछले 6 महीने से घोड़ाही गांव के तालाब में वीआईपी जिंदगी जी रहा था। सुबह ताज़ी हवा, दिन में धूप सेंकना और शाम को स्वादिष्ट मछलियों का बुफे। किसी को परेशान नहीं किया, कोई शिकायत नहीं की।
लेकिन पता नहीं घड़ियाल अभ्यारण के कर्मचारियों को मेरी खुशी क्यों रास नहीं आई!
आज सुबह देखा तो पूरी टीम लेकर पहुंच गए। मैं समझ गया—लगता है मेरी ‘तालाब वाली सरकारी नौकरी’ खत्म होने वाली है।
मैंने कहा, ‘साहब, क्या कमी है यहां? घर जैसा माहौल है, पड़ोसी भी अच्छे हैं, मछलियां भी बढ़िया हैं!’
लेकिन नहीं… उन्होंने कहा, ‘चलो भाई, बहुत छुट्टियां मना लीं, अब वापस सोन नदी चलो।’
फिर क्या था, मुझे बड़े प्यार से पकड़कर गाड़ी में बैठाया गया। पूरी यात्रा में मैं यही सोचता रहा कि आखिर मेरी गलती क्या थी? ज्यादा मछलियां खाना?
खैर साहब, आपकी इज्जत रख ली, सोन नदी वापस आ गया हूं। कुछ दिन यहां रहूंगा…
लेकिन एक बात कान खोलकर सुन लो…
जैसे ही मौका मिला, मैं फिर अपने पुराने अड्डे घोड़ाही तालाब पहुंच जाऊंगा!
अरे भाई, वहां की मछलियों का स्वाद ही कुछ और है… एक बार जो खा ले, वो भूल नहीं सकता!
फिलहाल आपका मगर दोस्त सोन नदी के जगदाहा घाट में हाजिरी लगा चुका है।
नोट: अगर अगले कुछ महीनों में फिर से घोड़ाही तालाब में मेरी एंट्री की खबर आए, तो हैरान मत होना… आखिर दिल तो वहीं बसता है!

