रीवा रियासत का वो इतिहास, जिसे पढ़कर नसों में दौड़ने लगेगी ज्वाला
The Untold Story of Naikahai War: 200 वीरों ने 10,000 मराठों को दी मात
रीवा। मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक धरती रीवा केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने bravery, sacrifice और royal courage के लिए भी जानी जाती है। आज हम आपको रीवा रियासत के उस स्वर्णिम अध्याय से रूबरू करा रहे हैं, जिसे इतिहास की धूल ने लगभग ढक दिया है। यह कहानी है 1796 के नैकहाई युद्ध (Naikahai War) की, जहां महज 200 योद्धाओं ने 10 हजार मराठा सैनिकों के सामने झुकने से इनकार कर दिया।
रीवा के वरिष्ठ इतिहासकार असद खान के अनुसार, आज से लगभग 227 वर्ष पहले, मराठा शासक अली बहादुर, जो पेशवा बाजीराव और मस्तानी का पौत्र था, भारी सेना के साथ रीवा पर चढ़ आया। मराठा सेना चोरहटा तक पहुंच चुकी थी और पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल था। उस समय रीवा रियासत पर महाराजा अजीत सिंह का शासन था, लेकिन सीमावर्ती युद्धों और आर्थिक कमजोरी के चलते वे प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति में नहीं थे।
ऐसे संकट के समय में इतिहास के मंच पर प्रवेश करती हैं महारानी कुंदन कुमारी—रीवा की वह शेरदिल महारानी, जिनका नाम आज भी women leadership और war strategy की मिसाल है। मराठा राजा द्वारा टैक्स की मांग को महाराजा अजीत सिंह ने सिरे से खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह आक्रमण हुआ।
जब मराठा सेनापति ने समझौते का प्रस्ताव रखा, तब महारानी कुंदन कुमारी ने साफ शब्दों में मना कर दिया। उन्होंने एक अनोखा और चुनौतीपूर्ण संदेश रीवा के वीरों तक पहुंचाया—
“जो युद्ध के लिए तैयार हैं, वे पान का बीड़ा उठाएं, और जो नहीं, वे चूड़ियां पहन लें।”
यह संदेश किसी आदेश से अधिक honor challenge था। रीवा के वीरों में जोश भर गया। किसी ने चूड़ियां नहीं पहनीं—सबने पान का बीड़ा उठाया और मृत्यु से आंख मिलाने का संकल्प लिया।
नैकहाई की रणभूमि में मात्र 200 योद्धाओं ने 10 हजार मराठा सैनिकों का सामना किया। इस युद्ध का नेतृत्व स्वयं महारानी कुंदन कुमारी ने किया। इतिहास बताता है कि युद्ध के दौरान महारानी ने अद्भुत साहस दिखाते हुए मराठा सेनापति का सिर धड़ से अलग कर दिया। सेनापति का धड़ नैकहाई में ही दफन किया गया, जबकि उसका सिर रीवा के उपरहटी किले के मुख्य द्वार के नीचे दबाया गया—ताकि भविष्य में कोई भी आक्रांता उस रास्ते से गुजरते हुए रीवा की शक्ति को याद रखे।
इस अप्रत्याशित पराक्रम से मराठा सेना में भगदड़ मच गई और वे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इस प्रकार रीवा रियासत ने नैकहाई का ऐतिहासिक युद्ध जीत लिया।
युद्ध में शहीद हुए रीवा के वीरों की स्मृति में महाराजा और महारानी ने नैकहाई युद्धस्थल पर छतरियों (memorial chhatris) का निर्माण करवाया। यहां तक कि मराठा सेनापति के लिए भी एक छतरी बनवाई गई—जो रीवा की royal dignity और मानवता को दर्शाती है।
दुर्भाग्यवश, समय के साथ यह गौरवशाली स्थल government neglect का शिकार हो गया। आज नैकहाई की छतरियां टूट रही हैं, परिसर वीरान है और नई पीढ़ी इस वीरगाथा से अनजान होती जा रही है। कई local history websites और regional शोध लेखों में इस युद्ध का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन संरक्षण के नाम पर आज भी सन्नाटा है।
रीवा की यह गाथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि identity और inspiration है। जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस स्थल को heritage site के रूप में विकसित करे, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि रीवा की धरती ने कैसे असंभव को संभव कर दिखाया था।
नैकहाई का युद्ध सिर्फ एक लड़ाई नहीं था,
यह रीवा की अस्मिता, स्वाभिमान और शौर्य की अमर कहानी है।
