महीनों की ‘साधना’ से तैयार होती है Himachali Shawl, 800 से 2 लाख रुपये तक पहुंचती है कीमत
जब पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है और ठंडी हवाएं रूह तक कंपा देती हैं, तब हिमाचल प्रदेश की महिलाएं अपने हुनर से गर्माहट बुनती हैं। हथकरघे पर तैयार होने वाली Himachali Shawl सिर्फ सर्दी से बचाने का साधन नहीं, बल्कि पहाड़ों की tradition, craft और heritage की जीवंत पहचान है।
कुल्लू, किन्नौर, मंडी और लाहुल-स्पीति जैसे इलाकों में जब बर्फबारी के कारण जनजीवन ठहर सा जाता है, तब भी महिलाओं के हाथ नहीं रुकते। घर के भीतर रखे हथकरघों पर महीनों की मेहनत और साधना से शॉल तैयार की जाती हैं। शुद्ध ऊन के धागों में पिरोई गई यह मेहनत आज premium product बनकर देश ही नहीं, बल्कि global market में भी अपनी पहचान बना चुकी है।
हाल ही में शिमला में आयोजित MSME Fest में हिमाचल प्रदेश की मंझोली और लघु उद्योग इकाइयों से जुड़ी महिलाओं ने इतिहास रच दिया। हथकरघा से निर्मित 4,023 शॉल एक साथ प्रदर्शित कर Guinness Book of World Record में अपना नाम दर्ज कराया। यह उपलब्धि न केवल हिमाचली शॉल की लोकप्रियता को दर्शाती है, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामूहिक शक्ति का भी प्रतीक है।
क्या बनाता है Himachali Shawl को खास?
हिमाचली शॉल की सबसे बड़ी खासियत है इसका pure wool और पारंपरिक डिज़ाइन। कुल्लू शॉल की ज्योमेट्रिकल बॉर्डर, किन्नौर की फाइन बुनावट और लाहुल-स्पीति के पारंपरिक मोटिफ्स इन्हें अलग पहचान देते हैं। हर शॉल में स्थानीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है।
महीनों की मेहनत से तैयार होती है एक शॉल
एक शॉल तैयार करने में 2 से 6 महीने तक का समय लग सकता है। पहले ऊन की सफाई, फिर धागा बनाना, रंगाई और उसके बाद हथकरघे पर बुनाई की प्रक्रिया होती है। हर स्टेप में अनुभव और धैर्य की जरूरत होती है। यही वजह है कि हिमाचली शॉल की कीमत 800 रुपये से शुरू होकर 2 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
महिलाओं की आत्मनिर्भरता की कहानी
हिमाचल की हजारों महिलाएं इस craft से जुड़कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। यह काम उन्हें घर बैठे रोजगार देता है और उनकी कला को सम्मान भी। आज Himachali Shawl सिर्फ एक garment नहीं, बल्कि महिलाओं की मेहनत और आत्मसम्मान की पहचान बन चुकी है।
विरासत से भविष्य तक
हिमाचली शॉल पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही heritage का हिस्सा है। आधुनिक fashion के साथ भी इसका मेल बैठ रहा है, जिससे इसकी मांग और बढ़ रही है। यही कारण है कि यह शॉल आज luxury और culture का perfect blend बन चुकी है।
हिमाचल की शॉल वास्तव में महीनों की साधना, महिलाओं की मेहनत और पहाड़ों की आत्मा को अपने धागों में समेटे हुए हैं।
