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वनांचल में आस्था का केंद्र मां कोटमहिन,नवरात्रि के सप्तमी में हजारों श्रद्धालु मिढुली पहुंचे

अमित श्रीवास्तव

By अमित श्रीवास्तव

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वनांचल में आस्था का केंद्र मां कोटमहिन,नवरात्रि के सप्तमी में हजारों श्रद्धालु मिढुली पहुंचे

अमित श्रीवास्तव कुसमी

सीधी जिले के वनांचल क्षेत्र कुसमी अंतर्गत संजय टाइगर रिजर्व के कोटमा पहाड़ में विराजमान मां कोटमहिन की आस्था आज भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। चैत्र नवरात्र के अवसर पर यहां आदिवासी समाज सहित अन्य लोगों के लोग बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना कर रहे हैं।सप्तमी के दिन हजारों लोगों ने पहाड़ चढ़कर मां कोटमहिन के दर्शन कर पूजा अर्चना की है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार मां कोटमहिन की महिमा अपार है। आदिवासी समाज के पूर्वजों के समय जब शैला और कर्मा गीतों के दौरान माता के प्रकट होकर नृत्य करने की कथाएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। इन घटनाओं की जानकारी गांव के बैगा, जो पूजा-अर्चना करते हैं, सिर्फ उन्हें होती थी।

मां के दरबार तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को दो पहाड़ पार कर मिढुली तक जाना पड़ता है। बताया जाता है कि हजारों वर्षों से क्षेत्रीय लोग यहां पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। गांव के हर घर के बीच आंगन में माता चौरा बनाकर मां को विराजमान किया जाता है और नवरात्रि के समय पूजा की जाती है। पूड़ी नारियल का होम दिया जाता है और संकट की घड़ी में आदिवासी क्षेत्र के लोग माता कोटमहिन को ही याद करते हैं।

ग्रामीणों के बताये अनुसार जब भी गांव में किसी प्रकार की बीमारी फैलती है, तो लोग मां को याद कर गांव के चौरा में पहुचकर विशेष पूजा करते हैं और फैली बीमारी को मुर्गी एवं बकरे को लेकर एक गांव से दूसरे गांव तक माता का आह्वान कर बीमारी को विदा करने की परंपरा भी होते देखा जाता हैं।

चैत्र नवरात्र के दौरान सुबह से शाम तक पूजा-पाठ का क्रम चलता है। मिढुली मे भगत चलता है यहां तक कि ज्वारे बोने के पहले दिन से माता को याद किया जाता है और लोगों के बोये ज्वारे में माता आती है भगत गाने के साथ नाचती हैं और ज्वारे के विसर्जन के समय भी सबसे पहले कोटमहिन देवी को द्वारा चढ़ावा अर्पित किया जाता है, इसके बाद पूरे गांव में भ्रमण कराया जाता है।विसर्जन किया जाता है।

वनांचल क्षेत्र कुसमी में मां कोटमहिन के प्रति आस्था और परंपरा का यह अनूठा संगम आज भी लोगों की गहरी धार्मिक भावना और संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है।

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