मुंबई का ‘डैडी’ अरुण गवली,मिल मजदूर के बेटे से माफिया डॉन, दाऊद और बाल ठाकरे को दी खुली चुनौती”
हम बात कर रहे है उस समय के मुंबई की,मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास में अरुण गवली का नाम एक ऐसे डॉन के रूप में दर्ज है, जिसने न सिर्फ दाऊद इब्राहिम से टक्कर ली, बल्कि बाल ठाकरे जैसे ताकतवर नेता को भी खुली चुनौती दे डाली।
बात कर रहे है उस समय की,17 जुलाई 1955 को जन्मे गवली के पिता मध्यप्रदेश के खंडवा से महाराष्ट्र रोजगार की तलाश में आए थे। मुंबई में गवली ने सिम्प्लेक्स मिल्स, गोदरेज और क्रॉम्पटन ग्रीव्स जैसी कंपनियों में मजदूरी की, लेकिन जल्द ही वह अपराध की दुनिया में कदम रख बैठा। भाई किशोर उर्फ पापा गवली के साथ उसने जुए के अड्डों पर काम शुरू किया और यहीं उसकी मुलाकात गैंगस्टर रामा नाइक और बाबू रेशिम से हुई। “भायखला कंपनी” का हिस्सा बनते ही गवली ने मुंबई के कई इलाकों में दबदबा कायम कर लिया।
जहा इसी दौर में गवली की दोस्ती दाऊद इब्राहिम से हुई। दोनों ने मिलकर तस्करी के धंधे में साझेदारी की, लेकिन 1988 में रामा नाइक की हत्या के बाद यह रिश्ता दुश्मनी में बदल गया। गवली ने अलग गैंग बना लिया और दोनों के बीच खूनी गैंगवार शुरू हो गई। 1992 में गवली के शूटरों ने दाऊद के जीजा इब्राहिम पारकर की हत्या कर दी, जिससे अंडरवर्ल्ड में सनसनी फैल गई।
वही दाऊद के दुबई भागने के बाद गवली ने भायखला की दगड़ी चाल को अपना गढ़ बना लिया। इस बीच उसे राजनीतिक समर्थन की जरूरत महसूस हुई और बाल ठाकरे ने खुले मंच से कहा की “उनके पास दाऊद है, हमारे पास गवली।” लेकिन सत्ता में आने के बाद शिवसेना-भाजपा सरकार ने अंडरवर्ल्ड के खिलाफ अभियान छेड़ दिया, जिससे गवली और ठाकरे आमने-सामने आ गए।
अरुण गवली ने 1997 में अपनी पार्टी “अखिल भारतीय सेना” बनाई और शिवसेना को सीधी चुनौती दी। 2004 में वह विधायक भी बना, लेकिन 2008 में शिवसैनिक कमलाकर जामसांडेकर की हत्या के मामले में गिरफ्तार हुआ। 2012 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
जहा करीब 17 साल जेल में रहने के बाद हाल ही में नागपुर सेंट्रल जेल से उसकी रिहाई हुई। एक मजदूर से डॉन और फिर नेता तक का सफर तय करने वाले गवली की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड की सबसे चर्चित दास्तानों में गिनी जाती है।

