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शिकारी से संरक्षक बने रीवा नरेश, सफेद बाघ “मोहन” ने बदल दी महाराजा मार्तण्ड सिंह की जिंदगी

Manoj Shukla

By Manoj Shukla

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शिकारी से संरक्षक बने रीवा नरेश, सफेद बाघ “मोहन” ने बदल दी महाराजा मार्तण्ड सिंह की जिंदगी

बघेलखंड के महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव का नाम आज भी विंध्य की धरती पर सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। एक ओर वे राजसी ठाठ-बाट, शिकार और साहसिक जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध रहे, तो दूसरी ओर वन्यजीव संरक्षण और सामाजिक सेवा के लिए भी उन्होंने ऐसी विरासत छोड़ी, जो उन्हें इतिहास में विशेष स्थान दिलाती है। रीवा रियासत के अंतिम और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण शासक रहे मार्तण्ड सिंह जूदेव का जीवन केवल एक राजा की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान का सफर है, जिसने समय के साथ खुद को बदला और समाज को नई दिशा दी।

एमपी रीवा राजघराने में जन्मे मार्तण्ड सिंह जूदेव ने अपने शासनकाल में शिक्षा, समाजसेवा और जनकल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने रीवा सैनिक स्कूल के निर्माण के लिए जमीन और संसाधन उपलब्ध कराए, जो आज देश के प्रतिष्ठित सैनिक शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है। आम जनता के बीच उनकी पहचान एक ईमानदार, दूरदर्शी और जनहितैषी शासक की थी। विंध्य प्रदेश के राजप्रमुख के रूप में भी उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाया।

हालांकि अब उनकी सबसे चर्चित पहचान सफेद बाघ “मोहन” से जुड़ी रही। 27 मई 1951 का वह दिन आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जब सीधी जिले के बरगाड़ी जंगल में एक बाघिन का शिकार करने के दौरान महाराजा की नजर गुफा में छिपे तीन शावकों पर पड़ी। इनमें एक शावक सफेद रंग का था, जो सामान्य बाघों से बिल्कुल अलग दिखाई देता था। यही शावक आगे चलकर दुनिया भर में “मोहन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जहा उस दौर में शिकार राजाओं की शान माना जाता था, लेकिन मार्तण्ड सिंह ने उस सफेद शावक को मारने के बजाय जीवित पकड़कर संरक्षित करने का फैसला लिया। वे उसे रीवा के गोविंदगढ़ पैलेस ले आए, जहां उसकी विशेष देखभाल की गई। धीरे-धीरे “मोहन” पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र बन गया और रीवा का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफेद बाघों की धरती के रूप में पहचाना जाने लगा। आज दुनिया में मौजूद अधिकांश सफेद बाघों का वंश “मोहन” से ही जुड़ा माना जाता है।

लेकिन फिर महाराजा के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 1954 में आया। बताया जाता है कि उमरिया के पनपथा जंगल में शिकार के दौरान उन्होंने एक बाघिन का शिकार किया, जो गर्भवती थी। जब उसके शरीर को काटा गया तो गर्भ में पल रहे शावक दिखाई दिए। इस घटना ने महाराजा को भीतर तक झकझोर दिया। यही वह क्षण था, जब उन्होंने शिकार छोड़ने का निर्णय लिया। इसके बाद उनका झुकाव वन्यजीव संरक्षण की ओर बढ़ता गया और वे लोगों को जंगल और वन्यजीव बचाने के लिए जागरूक करने लगे।

वही शिकार के मैदान में अपनी बहादुरी दिखाने वाले मार्तण्ड सिंह आगे चलकर वन्यजीव संरक्षण के प्रतीक बन गए। उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा समाजहित में दान किया और प्राकृतिक धरोहरों को बचाने की पहल की। रीवा और विंध्य क्षेत्र में आज भी लोग उन्हें केवल राजा नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में याद करते हैं।

जहा आज भी गोविंदगढ़ पैलेस में “मोहन” की यादें जीवित हैं। वहां बनी उसकी समाधि इतिहास, संवेदना और विरासत का प्रतीक मानी जाती है। महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव की कहानी यह संदेश देती है कि इंसान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशीलता ही उसे महान बनाती है।

Manoj Shukla

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मै मनोज कुमार शुक्ला 9 सालों से लगातार पत्रकारिता मे सक्रिय हूं, समय पर और सटीक जानकारी उपलब्ध कराना ही मेरी पहली प्राथमिकता है।

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