रीवा राजघराने की विरासत का अनमोल अध्याय, गोविंदगढ़ पैलेस की वो तस्वीरें, जिनमें आज भी जिंदा है शाही दौर
Govindgarh Palace की करीब 75 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें एक बार फिर अब इतिहास प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन गई हैं। साल 1950 के आसपास खींची गई इन तस्वीरों में रीवा राजघराने की शान, वैभव और शाही जीवनशैली की झलक साफ दिखाई देती है। खास बात यह है कि इन ऐतिहासिक तस्वीरों में रीवा नरेश Martand Singh भी नजर आते हैं, जिनका नाम भारत के पहले सफेद बाघ “मोहन” से हमेशा जुड़ा रहा।

एमपी के रीवा जिले की प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित गोविंदगढ़ पैलेस कभी बघेल राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था। इस भव्य महल का निर्माण वर्ष 1853 में रीवा रियासत के महाराजा Raghuraj Singh ने कराया था। विशाल झील के किनारे बने इस महल को उस दौर में इस तरह डिजाइन किया गया था कि गर्मियों में भी यहां का वातावरण बेहद ठंडा और सुकूनभरा बना रहे।
इस महल की वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है। बघेला और राजस्थानी स्थापत्य शैली के अनूठे मिश्रण से तैयार यह परिसर सिर्फ एक राजमहल नहीं, बल्कि उस दौर की कला, संस्कृति और राजसी सोच का जीवंत उदाहरण माना जाता है। महल परिसर में बने मंदिर, विशाल गलियारे, झरोखे और ऊंची दीवारें आज भी बीते युग की कहानी सुनाते हैं।

रीवा के गोविंदगढ़ पैलेस की पहचान सिर्फ उसकी भव्यता तक सीमित नहीं रही। यह वही स्थान है जहां भारत के पहले सफेद बाघ “मोहन” को रखा गया था। कहा जाता है कि मोहन सिर्फ एक शाही जानवर नहीं, बल्कि रीवा राजपरिवार का सदस्य माना जाता था। इसी वजह से गोविंदगढ़ को लंबे समय तक “टाइगर कंट्री” के नाम से भी पहचाना गया।
भारत की आजादी के बाद जब रियासतों का विलय हुआ, तब धीरे-धीरे इस महल की रौनक कम होने लगी। वर्षों तक उपयोग में रहने के बाद यह परिसर वीरान पड़ गया। हालांकि बाद में यहां बघेल राजवंश के इतिहास और रीवा के महाराजाओं की विरासत को दर्शाने वाला संग्रहालय भी बनाया गया, जिसने पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित किया।

वही बीते कुछ वर्षों में गोविंदगढ़ पैलेस फिर से सुर्खियों में आया। वर्ष 2018 में इसके संरक्षण और पुनर्विकास की योजना सामने आई, जिसके तहत महल के कुछ हिस्सों को लक्जरी हेरिटेज होटल के रूप में विकसित किया गया। अब इस ऐतिहासिक धरोहर को पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में तैयार करने की कोशिशें जारी हैं।
जहा स्थानीय लोगों के अनुसार, महल परिसर में स्थित महा मृत्युंजय मंदिर अपनी विशेष आस्था के लिए प्रसिद्ध है। वहीं, गोविंदगढ़ से रीवा किले तक बनी एक कथित गुप्त सुरंग की कहानियां आज भी लोगों के बीच रहस्य और रोमांच का विषय बनी हुई हैं।
वही गोविंदगढ़ पैलेस की ये दुर्लभ तस्वीरें केवल पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि रीवा के गौरवशाली इतिहास का वह आईना हैं, जिनमें आज भी शाही वैभव, विरासत और संस्कृति की चमक साफ दिखाई देती है।

