11 घंटे इंतजार, फिर भी प्रभारी मंत्री ने मोड़ा मुंह,विधायक ने संभाली फरियाद, कलेक्टर के फोन पर रात में दौड़ा प्रशासन
सीधी जिले के सर्किट हाउस में गुरुवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए। ग्राम कुचवाही निवासी पंकज मिश्रा अपने चार दिव्यांग परिजनों के साथ सुबह 11 बजे से प्रभारी मंत्री दिलीप जायसवाल से मिलने और अपनी पीड़ा बताने के लिए इंतजार करते रहे। परिवार का आरोप है कि करीब 11 घंटे इंतजार के बाद शाम 7:15 बजे जब प्रभारी मंत्री पहुंचे तो उन्होंने आवेदन लेने के बजाय परिवार को अनदेखा कर आगे बढ़ गए।
हालांकि, मौके पर मौजूद सीधी विधायक रीती पाठक ने परिवार की समस्या सुनी, आवेदन लिया और तत्काल कलेक्टर विकास मिश्रा को मामले से अवगत कराया। कलेक्टर ने भी गंभीरता दिखाते हुए तुरंत सीएमएचओ डॉ. अशोक खरे को फोन कर परिवार की समस्या का समाधान कराने के निर्देश दिए। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और रात करीब 8 बजे जिला अस्पताल में परिवार की प्रक्रिया शुरू कराई गई।
पंकज मिश्रा ने बताया कि उनके परिवार में कुल छह सदस्य हैं, जिनमें चार दिव्यांग हैं। इनमें दो सदस्यों की 100 प्रतिशत दिव्यांगता दर्ज है। बावजूद इसके पिछले तीन माह से दिव्यांग पेंशन बंद है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब तक उनका यूडीआईडी (UDID) नंबर जनरेट नहीं होने के कारण उन्हें पेंशन सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल रहा है।
पंकज का कहना है कि पिछले एक महीने से वे लगातार जिला अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं। मेडिकल बोर्ड नहीं बैठने और अधिकारियों की उदासीनता के कारण उनका काम नहीं हो पाया। हर बार चार पहिया वाहन किराये पर लाने के लिए करीब एक हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन इसके बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है। परिवार में पंकज कुमार मिश्रा, वीणा मिश्रा, सुलेखा मिश्रा और रन्नू मिश्रा दिव्यांग हैं।
वहीं, जब इस संबंध में सीएमएचओ डॉ. अशोक खरे से पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि वे प्रभारी मंत्री के कार्यक्रम में व्यस्त हैं और फिलहाल कोई जानकारी नहीं देंगे।
यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल छोड़ गया है। यदि एक विधायक की पहल और कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद रात में समाधान की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, तो फिर एक दिव्यांग परिवार को तीन महीने तक सरकारी दफ्तरों और अस्पताल के चक्कर क्यों लगाने पड़े? आखिर संवेदनशील मामलों में व्यवस्था समय पर सक्रिय क्यों नहीं होती?

