भितरी संस्कृत महाविद्यालय में ‘योगो भवति दुःखहा’ विषय पर राष्ट्रीय व्याख्यान, योग को बताया दुःखों से मुक्ति का प्रामाणिक मार्ग
रामपुर नैकिन (सीधी)। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली एवं शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, भितरी (जिला सीधी) के संयुक्त तत्वावधान में “योगो भवति दुःखहा” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय व्याख्यान का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न शिक्षाविदों एवं विद्वानों ने योग और भारतीय दर्शन के माध्यम से शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक जीवन को संतुलित बनाने तथा दुःखों से मुक्ति के उपायों पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती के पूजन के साथ हुआ। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सपन कुमार पण्डा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्य पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी (प्राचार्य, श्री जयदेव वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय, कर्वी, चित्रकूट) ने कहा कि योग केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और सार्थक बनाने का प्रभावी माध्यम है।
मुख्य वक्ता डॉ. नीरज शर्मा (प्राचार्य, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, देवेंद्रनगर, पन्ना) ने श्रीमद्भगवद्गीता, पुराणों एवं दर्शनशास्त्र के संदर्भों के माध्यम से बताया कि योग, मानसिक संतुलन और निष्काम कर्म जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रभावी मार्ग है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. ज्योत्स्ना द्विवेदी ने संस्कृत साहित्य एवं भारतीय दर्शन में योग के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. कमलेश्वर प्रसाद आजाद (प्राचार्य, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामपुर नैकिन) ने कहा कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि चित्त की शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त करने का प्रमाणिक मार्ग है।
द्वितीय सत्र में डॉ. पूजा ने विद्यार्थियों को योगिक दर्शन को दैनिक जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया। डॉ. प्रेम शंकर मिश्र ने योग को मानसिक एवं आध्यात्मिक संतुलन का सबसे सशक्त माध्यम बताया, जबकि डॉ. बुद्धिमान प्रसाद द्विवेदी ने यम, नियम और ध्यान के पालन से तनावमुक्त एवं आनंदमय जीवन जीने का संदेश दिया। डॉ. राघवेंद्र मोहन त्रिपाठी ने आधुनिक जीवनशैली में योग की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए इसे स्वस्थ और श्रेष्ठ जीवन की आधारशिला बताया।
कार्यक्रम के संयोजक एवं संचालक डॉ. रमाकांत त्रिपाठी ने योग की दार्शनिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग व्यक्ति को सांसारिक विकारों से ऊपर उठाकर आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।
अंत में डॉ. देवेंद्र कुमार तिवारी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन सामूहिक शांति पाठ के साथ हुआ।
इस अवसर पर चुरहट महाविद्यालय के प्राचार्य रमाकांत दुबे, डॉ. मनोज तिवारी, डॉ. अनामिका चतुर्वेदी, ग्रंथपाल सबीहा बेगम, राजमणि यादव, बांके बिहारी शुक्ल सहित प्रदेश के सात महाविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय व्याख्यान ने भारतीय ज्ञान परंपरा, योग दर्शन एवं संस्कृत अध्ययन के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षाविदों में नई ऊर्जा, जागरूकता और सकारात्मक सोच का संचार किया।

