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जिले के छात्रावासों एवं आश्रमों का नहीं होता औचक निरीक्षण

Abhinay Shukla

By Abhinay Shukla

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संवाददाता अनिल शर्मा

ग्रामीण छात्रावासों में नहीं मिलती आवश्यक सुविधाएं

सीधी जिले में आदिम जाति कल्याण विभाग के संचालित छात्रावासों एवं आश्रमों में रहने वाले बच्चों को शासन की ओर से निर्धारित सुविधाएं मुहैया नहीं हो रही हैं। पिछले वर्ष से ही इस तरह की शिकायतें सबसे ज्यादा बनी हुई हैं। तत्संबंध में चर्चा के दौरान छात्रावास एवं आश्रमों से जुड़े सूत्रों ने बताया कि व्यवस्थाओं के लिए बजट अवश्य मिलता है। उस बजट को खर्च करने की जिम्मेदारी अधीक्षकों के ऊपर रहती है। अधीक्षक छात्रावास एवं आश्रमों में रहने वाले बच्चों के लिए सुबह से लेकर रात तक की कार्ययोजनाओं एवं मीनू का निर्धारण करते हैं। सुबह बच्चों को चाय एवं नास्ता मिलना चाहिए। शहरी क्षेत्र में तो खानापूर्ति कर दी जाती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को सीधे भोजन दिया जाता है। बीच-बीच में अवकाश या अन्य दिनों में नास्ता की औपचारिकताएं ग्रामीण क्षेत्रों में भी निभाई जाती हैं। यह दीगर बात है कि नियमित तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में नास्ता नहीं दिया जाता। इसके अलावा छात्रावासों एवं आश्रमों में बच्चों के लिए जो भोजन बनता है उसमें गुणवत्ता को पूरी तरह से नजर अंदाज किया जाता है। बच्चों को दाल चावल एवं सब्जी के नाम पर पीला पानी परोसा जाता है। जिसको लेकर हमेंशा शिकायतें बनी रहती हैं।

छात्रावास एवं आश्रमों में पदस्थ अधीक्षक अंगद की तरह पांव जमाए हुए हैं। इनका स्थानांतरण न होने के कारण मनमानी और भी चरम पर बनी हुई है। बच्चों को नास्ता एवं भोजन के नाम पर मिलने वाला आधा बजट इनके द्वारा डकार लिया जाता है। इसके अलावा विभाग की ओर से अन्य कार्यों के लिए मिलने वाला बजट भी छात्रावास एवं आश्रमों में खर्च करने की बजाय फर्जी बिल बाउचर लगाकर हजम कर लिया जाता है। सीधी जिले के आदिवासी क्षेत्रों में छात्रावास एवं आश्रम संचालित हो रहे हैं।

यहां के रहवासी बच्चों को सुविधाओं के लिए हमेंशा मोहताज रहना पड़ता है। गरीब परिवारों के बच्चों का दाखिला यहां होने के कारण वह चाह कर भी कोई विरोध नहीं कर पाते हैं। उनके घर वाले भी इसी वजह से चुप रहने में ही भलाई समझते हैं।

सीधी जिले में छात्र एवं छात्राओं के लिए अलग-अलग छात्रावास संचालित हो रहे हैं। जिला मुख्यालय में ही संचालित आदिवासी छात्रावासों की हालत सही नहीं है। यहां संचालित छात्रावासों एवं आश्रमों की जिम्मेदारी संभालने वाले शिक्षक एवं शिक्षिकाएं पूरी तरह से स्वेच्छाचारी हैं। उसका खास कारण यह भी है कि विभाग के बड़े अधिकारी कोई आकस्मिक निरीक्षण नहीं करते हैं। जिसके चलते छात्रावास एवं आश्रमों में बच्चों को साबुन तेल जैसी छोटी सुविधाएं भी मनमानी तौर पर मिलती हैं। कई बच्चे तो अपने घरों से साबुन, तेल की व्यवस्था बनाकर रखते हैं। छात्रावास एवं आश्रम की ओर से यह सुविधाएं मिलेंगी या नहीं निश्चित नहीं रहता। छात्रावास एवं आश्रमों की दयनीय हालत की जानकारी आम लोगों के साथ विभागीय अधिकारियों को भी रहती है। फिर भी विभागीय अधिकारी व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद बनाने के लिए पूरी तरह से कागजी कोरमपूर्ति में ही जुटे रहते हैं।

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