जिंदा लोग खुद साबित कर रहे हैं कि वे जिंदा हैं, कागजों में मौत बांट रहा पंचायत सचिव
उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
जिले में एक ऐसा अजीब मामला सामने आया है, जिसे सुनकर लोग हंसें या सिर पकड़ लें, समझ नहीं पा रहे। यहां सरकारी कागजों में लोग मर चुके हैं… लेकिन असलियत में वे खुद दफ्तर पहुंचकर कह रहे हैं साहब, हम अभी जिंदा हैं।
मामला करकेली जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत बड़ागांव का है, जहां पंचायत सचिव की कारगुजारियां किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लग रहीं। आरोप है कि सचिव ने कुछ लोगों को गरीबी रेखा सूची से बाहर कर दिया, कुछ को अपात्र घोषित कर दिया और हद तो तब हो गई जब दो लोगों को सीधे कागजों में मृत ही बता दिया।
दिलचस्प बात ये है कि जिन लोगों को मृत घोषित किया गया, वे खुद चलकर जिला पंचायत सीईओ के पास पहुंच गए। उनका कहना था सर हम सामने खड़े हैं, सांस ले रहे हैं, बात कर रहे हैं… अब आप ही बता दीजिए कि हम जिंदा हैं या सरकारी कागज सही हैं?
पीड़ित अशोक द्विवेदी का कहना है कि उनका नाम बीपीएल सूची से यह कहकर हटा दिया गया कि उनके परिवार में शासकीय कर्मचारी हैं, जबकि हकीकत में पूरा परिवार मजदूरी करके गुजर-बसर करता है। वहीं जुगराज सिंह गोंड़, जिन्हें मृत घोषित कर दिया गया, ने कहा मैं आदिवासी हूं, गरीब हूं… अब अगर कागजों में मर गया हूं तो जाऊं कहां?
गांव के अन्य लोगों का भी आरोप है कि सचिव ने मनमाने तरीके से कई परिवारों को योजनाओं से बाहर कर दिया। किसी के नाम के आगे सरकारी नौकरी , तो किसी के नाम के आगे वाहन मालिक जैसी वजहें लिख दी गईं, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
सबसे मजेदार (और चिंताजनक) पहलू यह है कि संबंधित सचिव पहले भी विवादों में रह चुके हैं। 24 दिसंबर 2024 को उन्हें लोकायुक्त टीम ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था। उस समय उन्हें निलंबित किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें दूसरी पंचायत में फिर से जिम्मेदारी दे दी गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि सचिव खुद को एक बड़े संगठन का पदाधिकारी बताकर दबाव बनाते हैं और कहते हैं मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हालांकि संबंधित संगठन के जिम्मेदारों ने पहले ही इस दावे से किनारा कर लिया था।
अब जब मामला तूल पकड़ चुका है, तो जिला पंचायत सीईओ अभय सिंह ओहरिया ने जांच का आश्वासन दिया है। उनका कहना है कि पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और यदि किसी तरह की गड़बड़ी पाई गई तो कार्रवाई जरूर होगी।
लेकिन गांव के लोगों का दर्द साफ है। उनका कहना है कि योजनाओं का लाभ तो दूर, अब उन्हें अपने जिंदा होने का प्रमाण देना पड़ रहा है।
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर कागजों में जिंदा लोग मर सकते हैं, तो फिर सरकारी रिकॉर्ड पर भरोसा कैसे किया जाए?
फिलहाल गांव में चर्चा यही है यहां जीते जी मरने का सर्टिफिकेट मिल रहा है… और जिंदा रहने के लिए दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।




