जेसीबी नहीं मिली, चुनावी काम आ गया, फाइल रुक गई
आंगनबाड़ी की जमीन पर अतिक्रमण और अफसरों के बहानों की पूरी कहानी
उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
जिले के बिरसिंहपुर पाली के वार्ड क्रमांक 7 और 8 की आंगनबाड़ी आज भी किराए के भवन में संचालित हो रही है। यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक सुस्ती और विभागीय टालमटोल का नतीजा है। हैरानी की बात यह है कि आंगनबाड़ी भवन के लिए शासकीय भूमि आवंटित है, न्यायालय के आदेश हैं, टीम गठित है, तारीख तय है, फिर भी जमीन आज तक अतिक्रमण मुक्त नहीं हो सकी।
कागजों में आदेश, जमीन पर कब्जा
ग्राम पाली स्थित आ.ख.न. 648 रकवा 0.154 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर 10 सितंबर 2025 को न्यायालय नायब तहसीलदार वृत्त पाली ने स्पष्ट आदेश पारित किया था।अतिक्रमणकर्ता देवीशंकर सेन और प्रेमचंद शिवहरे पर म.प्र. भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 248 के तहत जुर्माना लगाते हुए भूमि से बेदखल करने के निर्देश दिए गए।
इतना ही नहीं, आदेश के पालन के लिए राजस्व अधिकारियों, पटवारियों और पुलिस बल के साथ कार्रवाई करने की पूरी योजना बनाई गई। आदेश में साफ लिखा गया कि 17 दिसंबर 2025 को अतिक्रमण हटाकर पालन प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।
एक दिन गए, खाली हाथ लौट आए
इस मामले में कार्यपालिक मजिस्ट्रेट लक्ष्मीकांत शर्मा ने जो बताया, उसने प्रशासनिक तैयारी की पोल खोल दी। उनके अनुसार, टीम एक दिन मौके पर पहुंची थी, लेकिन नगर पालिका द्वारा जेसीबी और जरूरी कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि कार्रवाई शुरू ही नहीं हो सकी और टीम को वापस लौटना पड़ा। यानी जिस कार्रवाई की तैयारी महीनों पहले से थी, वह एक मशीन और कुछ कर्मचारियों के अभाव में ठप पड़ गई।
अब चुनावी काम बना ढाल
कार्रवाई में देरी की दूसरी बड़ी वजह चुनाव आयोग का एसईआर कार्य बताया जा रहा है। कार्यपालिक मजिस्ट्रेट का कहना है कि एसईआर का काम समय-सीमा वाला होता है, जिसे टाला नहीं जा सकता। यह कार्य अभी करीब 12 दिन और चलेगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस दौरान न्यायालय का नियमित काम लगभग बंद है, क्योंकि पूरा प्रशासनिक अमला चुनावी प्रक्रिया में लगा हुआ है। दिलचस्प यह है कि रविवार के दिन भी अधिकारी कार्यालय में बैठकर चुनावी काम कर रहे हैं, लेकिन आंगनबाड़ी की जमीन से कब्जा हटाने के लिए समय नहीं निकल पा रहा।
नगर पालिका और राजस्व विभाग की रस्साकशी
पूरा मामला अब नगर पालिका और राजस्व विभाग के बीच जिम्मेदारी के खेल में उलझ गया है। कार्यपालिक मजिस्ट्रेट ने साफ तौर पर कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए जेसीबी और मैनपावर की व्यवस्था नगर पालिका को करनी थी, लेकिन नगर पालिका ने न मशीन दी और न ही आदमी।
दूसरी ओर, नगर पालिका स्तर से यह दलील दी जाती रही है कि जब कार्रवाई राजस्व विभाग के नेतृत्व में होनी थी, तो संसाधनों की स्पष्ट मांग और बेहतर समन्वय होना चाहिए था। इस आपसी आरोप-प्रत्यारोप में जमीन वहीं की वहीं है।
17 दिसंबर की तारीख गुजर गई, कोई जवाबदेही नहीं
सबसे गंभीर सवाल यह है कि न्यायालय द्वारा पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की अंतिम तारीख 17 दिसंबर 2025 थी। यह तारीख बीत जाने के बावजूद न तो अतिक्रमण हटाया गया और न ही प्रतिवेदन प्रस्तुत हुआ। इसके बावजूद किसी अधिकारी से जवाब नहीं मांगा गया। यह स्थिति दिखाती है कि न्यायालय के आदेश भी तब तक प्रभावी नहीं होते, जब तक उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति न हो।
किराए के भवन में सिमटी आंगनबाड़ी
इन सभी बहानों और विभागीय खींचतान का खामियाजा वार्ड 7 और 8 की आंगनबाड़ी को भुगतना पड़ रहा है। छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के लिए बनी यह संस्था आज भी अस्थायी और सीमित सुविधाओं वाले किराए के भवन में चल रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से भी यही कहा जा रहा है कि कब्जा हटाने का अधिकार और जिम्मेदारी राजस्व विभाग की है।
बहानों की फाइल भारी, बच्चों का भविष्य हल्का
पूरा मामला यह सवाल छोड़ जाता है कि जब हर विभाग के पास अपना-अपना बहाना तैयार है, तो जिम्मेदारी किसकी है? जेसीबी नहीं मिली, चुनाव आ गए, समय नहीं है, कोर्ट का काम बंद है। इन सबके बीच आंगनबाड़ी का भवन सिर्फ फाइलों में बन रहा है।
जब तक प्रशासन बहानों से बाहर निकलकर ठोस कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक आंगनबाड़ी की जमीन अतिक्रमण में और सरकारी व्यवस्था सवालों में ही फंसी रहेगी।
