पर्वों की मूल भावना से भ्रांतियों को दूर करने और स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक नज़रिया विकसित करने के उद्देश्य से बाल संस्था ‘मोगली पलटन’ ने अपने 9-मासीय अभियान ‘त्योहार का व्योहार 2.0’ की शुरुआत की है। इस श्रृंखला की पहली कार्यशाला नागपंचमी के अवसर पर सीधी में आयोजित की गई, जिसमें कक्षा 1 से 8वीं तक के विद्यार्थियों ने साँपों से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों और उनके वैज्ञानिक पहलुओं को समझा।
यह पहल आगामी नौ महीनों तक संचालित होगी, जिसके तहत प्रत्येक माह एक प्रमुख त्योहार के पर्यावरणीय, सामाजिक और वैज्ञानिक आयामों पर केंद्रित कुल नौ कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँगी।
पूर्वाग्रह मूल्यांकन और वस्तुनिष्ठ सुधार
कार्यशाला का ढांचा विद्यार्थियों में तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया था। सत्र के प्रथम चरण में प्रतिभागियों को साँपों से संबंधित प्रचलित मान्यताओं पर आधारित 20 वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्नों का एक प्रपत्र दिया गया। प्रारंभिक मूल्यांकन में अधिकांश बच्चों के उत्तर समाज में व्याप्त पारंपरिक धारणाओं पर आधारित पाए गए।
इसके पश्चात, विषय-विशेषज्ञों द्वारा बच्चों के साथ संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। इसमें साँपों के जैविक व्यवहार—जैसे उनका मांसाहारी होना, बीन की तरंगों के प्रति सजगता, तथा पारिस्थितिकी तंत्र में चूहों की संख्या को नियंत्रित कर फसलों की सुरक्षा करने में उनकी भूमिका पर तथ्यात्मक चर्चा की गई।
चर्चा के उपरान्त सत्र के अंत में जब वही प्रश्न-पत्र दोबारा दिया गया, तो परिणाम चौंकाने वाले थे—लगभग शत-प्रतिशत बच्चों ने भ्रांतियों को नकारते हुए सटीक वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित उत्तर चुने।
रोल-प्ले के ज़रिए व्यावहारिक समझ
सत्र के अंतिम चरण में व्यावहारिक शिक्षण के लिए एक ‘रोल-प्ले’ गतिविधि आयोजित की गई। इसमें बच्चों ने एक घेरा बनाकर साँपों की विभिन्न प्रजातियों का प्रतिनिधित्व किया, जबकि घेरे के केंद्र में एक विद्यार्थी ने ‘मानव’ की भूमिका निभाई। मानव पात्र द्वारा व्यक्त की गई पारंपरिक भ्रांतियों का उत्तर बाल-प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक तर्कों और पारिस्थितिकीय तथ्यों के साथ दिया।
इस गतिविधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में बिना किसी नैतिक दबाव के उत्सुकता, स्वतंत्र सोच, सहज करुणा और कृतज्ञता जैसे जीवन-मूल्यों का स्वाभाविक विकास करना था।
मोगली पलटन के अनुसार, त्योहारों की मूल नींव प्रकृति के प्रति आभार और सह-अस्तित्व पर आधारित है। समय के साथ जुड़ी भ्रांतियों को हटाकर नई पीढ़ी को वैज्ञानिक तथ्यों से जोड़ना ही इस 9-मासीय अभियान का मुख्य ध्येय है।