राजा रवि वर्मा की चित्रकला photo, बौद्ध शिल्प और धार्मिक उत्सवों का इतिहास, क्या ब्रिटिश काल में बदली गई भारत की धार्मिक चेतना?
भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास को लेकर समय-समय पर नए विमर्श सामने आते रहे हैं। हाल के वर्षों में इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच यह बहस तेज हुई है कि आधुनिक काल में जिस देवी-देवताओं की छवि को आज हम जानते हैं, उसका स्वरूप कब और कैसे तय हुआ।
इसी बहस के केंद्र में आते हैं प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा, जिनकी कलाकृतियों ने भारतीय जनमानस में देवी-देवताओं की दृश्य कल्पना को व्यापक रूप से स्थापित किया। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार राजा रवि वर्मा ने 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में देवी-देवताओं के यथार्थवादी चित्र बनाए, जिन्हें बाद में बड़े पैमाने पर photo छापा गया। माना जाता है कि भगवान शिव का एक चर्चित चित्र 1890 के दशक में बनाया गया, जिसमें उन्हें मूंछों सहित दर्शाया गया था, जो उस दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक कल्पना को दर्शाता है।
इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि ब्रिटिश काल में जब भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध स्थलों और शिल्पों की पुरातात्विक खोजें शुरू हुईं, तब सांची, भरहुत, अमरावती जैसे स्थानों से बड़ी संख्या में बौद्ध प्रतिमाएं और शिल्प सामने आए। इन शिल्पों की कलात्मक शैली ने भारतीय कला जगत को गहराई से प्रभावित किया।
कुछ वैचारिक धाराओं का दावा है कि बुद्धमाता महामाया, बोधिसत्व और अन्य बौद्ध शिल्पों की आकृतियों से प्रेरणा लेकर बाद में लक्ष्मी, सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की छवियों को लोकप्रिय रूप दिया गया। हालांकि मुख्यधारा के इतिहासकार इसे कलात्मक परंपराओं के आपसी प्रभाव के रूप में देखते हैं, न कि सीधी नकल के रूप में।
इसी क्रम में राजा रवि वर्मा द्वारा 1889–1894 के आसपास स्थापित प्रिंटिंग प्रेस को एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस प्रेस से पहली बार बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के रंगीन photo आम जनता तक पहुंचे। यही वह दौर था जब धार्मिक चित्र घर-घर पहुंचने लगे और एक समान धार्मिक प्रतीक गढ़े गए।
धार्मिक उत्सवों को लेकर भी इतिहास में मतभेद हैं। कुछ सामाजिक विचारकों का कहना है कि गणेशोत्सव, दुर्गाष्टमी और महाशिवरात्रि जैसे उत्सवों को ब्रिटिश काल में संगठित और सार्वजनिक रूप दिया गया, ताकि समाज को एक सांस्कृतिक पहचान के तहत जोड़ा जा सके। विशेष रूप से गणेशोत्सव को लोकमान्य तिलक द्वारा सार्वजनिक मंच प्रदान किया गया, जिससे यह एक सामाजिक और राजनीतिक चेतना का माध्यम भी बना।
वहीं, बौद्ध इतिहास से जुड़े विद्वानों का मानना है कि ब्रिटिश काल में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान और वैश्विक पहचान मिलने के बाद, भारत के भीतर धार्मिक और वैचारिक संघर्ष भी तेज हुए। इसी पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आंदोलन, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और धार्मिक पहचान की राजनीति को एक साथ देखा जाता है।
आज यह विषय केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। राजा रवि वर्मा की कला, बौद्ध शिल्पों की खोज और धार्मिक उत्सवों का स्वरूप ये सभी मुद्दे यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या भारत की धार्मिक चेतना समय के साथ स्वाभाविक रूप से बदली, या इसे योजनाबद्ध तरीके से आकार दिया गया?
