शहडोल में ‘शोले’ का लाइव रीमेक,सायरन बजाती पहुंची police
अगर किसी को लगे कि सिनेमा अब सिर्फ स्क्रीन तक सीमित है, तो शहडोल की एक पानी टंकी ने यह भ्रम तोड़ दिया। शुक्रवार को शहर ने ‘शोले’ का ऐसा दृश्य देखा, जिसमें वीरू का रोल निभा रहा था गोलू। फर्क बस इतना कि फिल्म में टंकी शराबबंदी की धमकी देती है, और यहां धमकी थी छलांग की, कैमरे की जगह थी भीड़ की आंखें, और बैकग्राउंड म्यूज़िक की जगह police की सायरन।
धनपुरी थाना क्षेत्र के विलियस नंबर-1, वार्ड नंबर-3 में स्थित पानी टंकी पर गोलू पिछले चार घंटे से चढ़ा हुआ था। नीचे सड़क पर कौतूहल, ऊपर टंकी पर गोलू बीच में सांस रोक देने वाला सस्पेंस। कभी वह मांगें रखता, कभी टंकी के किनारे तक जाकर छलांग की धमकी देता। हर पल ऐसा लग रहा था जैसे अगला सीन निर्णायक होगा।
गोलू को लेकर इलाके में लोग पहले से वाकिफ हैं। बताया गया कि युवक मानसिक रूप से कमजोर है। परिजनों का कहना है कि उसकी सुरक्षा के लिए कभी-कभी हाथ-पांव बांधकर घर में रखना पड़ा। वही बंधन इस कहानी का टर्निंग पॉइंट बना। बंधक से छूटते ही गोलू ने नाराज़गी को ऊंचाई दे दी और सीधे पानी टंकी पर जा चढ़ा।
यह पहली बार नहीं था जब गोलू ने ऊंचाई से अपनी बात रखी हो। हाल ही में 100 रुपये की मांग को लेकर वह मोबाइल टावर पर भी चढ़ चुका है। 17 जनवरी को घर के पास स्थित टावर पर उसका वही अंदाज़ देखा गया था आज वही स्टाइल, बस लोकेशन बदली।
नीचे police और प्रशासन के हाथ-पांव फूल चुके थे। चार घंटे की मशक्कत में कभी समझाइश, कभी निगोशिएशन, कभी रेस्क्यू की तैयारी हर विकल्प आज़माया गया। मौके पर धनपुरी थाना प्रभारी खेम सिंह पेंद्रो पुलिस बल के साथ मौजूद रहे। एक ओर सुरक्षा की चिंता, दूसरी ओर भीड़ का बढ़ता हुजूम स्थिति हर मिनट चुनौतीपूर्ण होती जा रही थी।
भीड़ के लिए यह दृश्य कौतूहल था, मगर प्रशासन के लिए परीक्षा। मोबाइल कैमरे ऑन थे, कानाफूसी चल रही थी “अब क्या होगा?” किसी ने कहा, “वीरू उतर आएगा,” तो किसी ने फुसफुसाया, “बस कूद न जाए।” यही वह पल थे, जहां खबर और फिल्म के बीच की रेखा धुंधली हो गई।
अंततः यह घटना केवल एक युवक की नहीं रही; यह शहर के सामने खड़ा सवाल बन गई,मानसिक स्वास्थ्य, परिवार की मजबूरी, प्रशासन की चुनौती और समाज की संवेदनशीलता। पानी टंकी पर खड़ा गोलू किसी फिल्म का सीन नहीं था, बल्कि हकीकत का वह फ्रेम था, जिसमें हर किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा था।
शहडोल ने उस दिन यह भी सीखा कि ड्रामा केवल पर्दे पर नहीं होता,कभी-कभी शहर की सबसे ऊंची टंकी ही सिनेमाघर बन जाती है।
