MP news:पुत्र की दीर्घायु की कामना के साथ महिलाएं आज गुरूवार को हलछठ का व्रत पूरी आस्था के साथ रखेंगी। पूजन सामग्री की दुकानें कई दिनों से बाजार के सडकों के किनारे सजी हुई हैं। जिनमें महिलाओं द्वारा जरूरत की सामग्री की खरीदी की जा रही है। भाद्रपद माह में हलछठ का व्रत रखा जाता है। इसे ललही छठ, बलदेव छठ, चंदन छठ, तनिछठी छठ, रंधन छठ और तिन्नी छठ के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि सप्तमी युक्त हलषष्ठी का योग बनता है और इसीलिए हलछठ पर्व मनाया जाता है। मान्यतानुसार हलछठ के दिन ही बलरामजी का जन्म हुआ था। बलराम श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे। हर साल जन्माष्टमी से दो दिन पहले हलछठ का पर्व मनाया जाता है। अधिकतर पुत्रवती स्त्रियां इस व्रत को रखती हैं। ज्योतिष के अनुसार इस साल 14 अगस्त के दिन हलछठ का व्रत रखा जाना है। इस साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि हलछठ जयंती 14 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा।
MP NEWS:पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि की शुरुआत 14 अगस्त 2025 को सुबह 4 बजकर 23 मिनट होगी और इसका समापन 15 अगस्त को सुबह 2 बजकर 7 मिनट पर होगी। हलछठ की पूजा सामग्री में महुआ का फल, फूल, पत्ते, लाल चंदन, कुश, चावल, मिट्टी का दीपक, ज्वार की धानी, पलाश, झरबेरी, सात प्रकार के अनाज और भुने चले शामिल किए जाते हैं। इस दिन कुल्हड़ और मटके की पूजा भी की जाती है। मान्यतानुसार हलछठ का व्रत पुत्रवती स्त्रियां रखती हैं। सुबह उठकर स्नान पश्चात व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन महिलाएं मिट्टी के बर्तनों में भुने अनाज और मेवे रखे जाते हैं। मिट्टी में गड्डा बनाया जाता है और उसकी गोबर से लिपाई करते हैं। इस गड्ढे को तालाब का रूप दिया जाता है। अब पूजा करने के लिए झरबेरी और पलाश की शाखा लेकर बांधी जाती है और मिट्टी में गाढ़ देते हैं। इसके बाद पूजा करते हुए भुने चने और जौ की बालियां चढ़ाई जाती हैं। सभी पूजा सामग्री एक-एक करके इस मिट्टी में अर्पित की जाती हैं। पूजा संपन्न हो जाने के बाद रात के समय चंद्रमा को देखकर व्रत खोला जाता है।
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