आदिवासियों की परंपरा पर प्रहार, वन विभाग पर उठे सवाल
उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
जिले में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में पातौर परिक्षेत्र में पुटू पिहरी तोड़ने वाले आदिवासियों को पकड़कर उनकी तस्वीरें जारी की गईं। विभाग ने इसे बड़ी उपलब्धि की तरह प्रचारित किया और जनसंपर्क के जरिए फोटो और प्रेस नोट तक मीडिया को भेज दिया। लेकिन इस कार्रवाई ने विभाग की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष दिलीप पांडे ने अपने फेसबुक पोस्ट में वन विभाग को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आदिवासी बहुल इस जिले में आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति ही वनों पर आधारित है। यहां के लोग पीढ़ियों से पुटू पिहरी तोड़ते हैं, महुआ बीनते हैं और इन्हीं संसाधनों पर अपनी आजीविका चलाते हैं। ऐसे में इन्हें अपराधी की तरह पकड़ना और तस्वीरें जारी कर जलील करना सरासर अन्याय है। उन्होंने कहा कि वन विभाग जानबूझकर आदिवासियों को अपराधी साबित करने का काम कर रहा है, ताकि ऊपर तक अपनी शूरवीरता का ढोल पीट सके।
गौरतलब है कि ग्रामीणों ने भी विभाग की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि पातौर बीट में अवैध उत्खनन और पेड़ों की कटाई खुलेआम होती है, लेकिन उस पर कोई रोकथाम नहीं होती। उल्टा, आदिवासी समाज के लोग जो अपनी जरूरतों के लिए जंगल से पुटू पिहरी तोड़ते हैं, उन्हीं पर विभाग सख्ती दिखाता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि यह सब सहायक संचालक भूरा गायकवाड़ की निगरानी में हो रहा है।
सहायक संचालक भूरा गायकवाड़ का पक्ष
संपर्क करने पर सहायक संचालक भूरा गायकवाड़ ने सभी आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा, मैं दिलीप पांडे और ग्रामीणों की बातों से सहमत नहीं हूं। पातौर क्षेत्र में पकड़े गए लोगों ने कोर क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश किया और 3-4 अलग-अलग अपराध किए हैं। वन विभाग की कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत की गई है। रही बात अवैध रेत खनन और जंगल कटाई की तो बीते दिनों मेरे द्वारा उस पर भी कार्रवाई की गई है। विभाग केवल आदिवासियों पर ही नहीं बल्कि हर अवैध गतिविधि पर सख्ती बरत रहा है।
इस पूरे मामले में उमरिया जनसंपर्क अधिकारी अरुणेंद्र सिंह ने कहा कि उन्होंने सिर्फ वही फोटो और प्रेस नोट जारी किया है जो सहायक संचालक गायकवाड़ ने उन्हें उपलब्ध कराया था। साफ है कि विभाग की ओर से कार्रवाई को प्रचारित करने की पूरी जिम्मेदारी गायकवाड़ पर ही है। सवाल यह उठता है कि जब जंगलों की वास्तविक समस्याओं पर आंखें मूंदी जा रही हैं, तो फिर केवल आदिवासियों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?
राजनीतिक और सामाजिक विरोध
दिलीप पांडे ने अपने पोस्ट में लिखा कि बर पार्क प्रबंधन आदिवासी समाज को जबरन प्रताड़ित कर अपराधी बना रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की कार्रवाई नहीं रोकी गई तो आदिवासी समाज और राजनीतिक दल आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल आदिवासियों के अधिकारों पर हमला नहीं है, बल्कि संविधान द्वारा मिले जंगल-जमीन से जुड़े हक को छीनने की साजिश है।
वन विभाग की ओर से बार-बार यह कहा जाता है कि जंगलों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन सवाल यह है कि सुरक्षा के नाम पर आखिर क्यों केवल आदिवासियों को ही टारगेट किया जा रहा है? यदि विभाग वास्तव में गंभीर है तो अवैध खनन, लकड़ी की तस्करी और बड़े पैमाने पर हो रहे जंगलों के नुकसान पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
इस पूरे घटनाक्रम ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। फेसबुक पर आए पांडे के पोस्ट को स्थानीय स्तर पर काफी समर्थन मिल रहा है और लोगों का कहना है कि विभाग का यह रवैया आदिवासी संस्कृति को खत्म करने की साजिश है। अब देखना होगा कि शासन इस मामले को संज्ञान में लेकर क्या कदम उठाता है।
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