Rewa: कैबिनेट मंजूरी के बिना लक्ष्मण बाग में निर्माण शुरू, तपोभूमि पर उठे सवाल”
Rewa के लक्ष्मण बाग संस्थान की भूमि को दूसरे संस्थान को दिए जाने का मामला बड़ा विवाद बन गया है। शासन स्तर पर अब तक न तो कैबिनेट से मंजूरी मिली है और न ही जमीन हस्तांतरण का रिकॉर्ड दर्ज हुआ है। इसके बावजूद परिसर में निर्माण कार्य शुरू हो जाने से ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में गहरी नाराज़गी है।
संस्थान से जुड़े पक्षकारों का कहना है कि जब तक विधिवत बदलानामा, बाजार मूल्य पर नई जमीन और कैबिनेट की स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक किसी भी तरह का निर्माण पूरी तरह अवैध है। अधिवक्ता बी.के. माला ने रीवा संभागायुक्त सहित शासन को लिखित शिकायत सौंपते हुए कहा कि लक्ष्मण बाग ट्रस्ट की नियमावली तथा राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित संविधान का अवलोकन किए बिना भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। उनका यह भी सुझाव है कि इस ऐतिहासिक स्थल को अयोध्या की तर्ज पर विकसित किया जाए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लक्ष्मण बाग का इतिहास लगभग चार शताब्दियों पुराना है। इसका निर्माण Rewa नरेशों ने सन् 1618 में कराया था। बिछिया नदी के किनारे स्थित यह धरोहर ऐसी अद्वितीय रचना है जहां चारों धामों केदारनाथ, बद्रीनाथ, द्वारका और जगन्नाथ की प्रतिमाएं एक ही परिसर में स्थापित की गईं। इसका उद्देश्य था कि जो श्रद्धालु दूरस्थ हिमालय या समुद्रतटीय तीर्थों तक नहीं जा सकते, वे यहां आकर वही पुण्य प्राप्त कर सकें।
इतिहासकार बताते हैं कि युवराज रघुराज सिंह को मानसिक कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए संत मुकुंदाचार्य ने इसी स्थल पर 21 दिन की साधना की थी। तब से यह तपोभूमि दिव्यता और आस्था का केंद्र मानी जाती है।
संस्थान की धरोहर और गिरावट
1935 तक लक्ष्मण बाग संस्थान के अधीन लगभग 65 मंदिरों का संचालन होता था। देश के अनेक हिस्सों में इसके आश्रम और पीठें स्थापित थीं। लेकिन देखरेख और प्रबंधन की कमी से संस्थान की कई संपत्तियां खंडहरनुमा हो गई हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि यदि इसे संरक्षित और विकसित किया जाए तो यह रीवा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक मानचित्र पर विशेष पहचान दिला सकता है।
विवाद का मूल सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक शासन स्तर से कैबिनेट की विधिवत मंजूरी नहीं मिलती, निर्माण कार्य तत्काल रोका जाना चाहिए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शासन ने नियम विरुद्ध हस्तांतरण और निर्माण को नहीं रोका तो आंदोलन तेज़ किया जाएगा।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि तपोभूमि लक्ष्मण बाग की इस पावन भूमि पर बिना कानूनी स्वीकृति के निर्माण की अनुमति किसने और कैसे दे दी?
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